क्यों मनाते है गणेस चतुर्थी?

हिन्दूओं के त्योहारों में से एक महवपूर्ण त्योहार गणेस चतुर्थी है |यह पर्व पुरे देश में खुशियों के साथ मनाया जाता है |किन्तु महाराष्ट्र में गणेस चतुर्थी बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता है |यह त्योहार पुरे 10 दिन का होता है |मूर्ति की स्थापना से लेकर 9 दिन पूजा होती |और 10 वी दिन बहुत ही खुशियों के साथ मूर्ति विसर्जन की जाती है |

हर साल गणेस चतुर्थी अगस्त और सितम्बर महीने के बिच में मनाया जाता है |इस साल ये शुभ दिन 2 सितम्बर को है |इस दिन पुरे देश में गणेस चतुर्थी मनाया जयेगा |

पुराणो के अनुसार गणेस जी का जन्म भादो मास के शुक्लपक्ष की चतुर्थी स्वाति नक्षत्र और सिंह लग्न के दिन हुआ था |इसलिए इस को गणेस चतुर्थी के रूप में मनाया जाता है |

शिव और पार्वती जी के पुत्र है गणेस जी |गण +पति =गणपति ,गण का अर्थ पवित्र और पति का अर्थ स्वामी होता है इसका मतलब पवित्रो का स्वामी |यधपि गणपति जी को पवित्रो का स्वामी माना जाता है |

हिन्दुओ धर्म के पूजाओ में सबसे प्रथम स्थान गणेस जी का है |किसी भी भगवान की पूजा हो सर्वप्रथम गणेस जी की पूजा की जाती है |इनका मान्यता सर्वप्रथम है |ऐसा काहा जाता है गणेस जी की पूजा पहले ना हो तो पूजा व्यर्थ हो जाती है |

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श्री गणेस जी कई नामो से जाने जाते है |जेसे -गजानन ,लंबोदर ,गणपति ,विनायक |जीतना प्यारा प्यारा नाम है उतनि ही निराली इनकी कहानी है |इनका प्रिय रंग लाल है ,प्रिय पुष्प भी लाल है जिनसे सिघ्र प्रश्न हो जाते है |चूहा गणेस जी की वाहन है,मोतीचूर की लडू पसंदिता भोग है जिससे सीघ्र प्रश्न हो जाते है |

गणेस पूजन के लिए शुभ मुहूर्त – 2 September सुबह 11 बजकर 4 मिनट से दोपहर 1 बजकर 37 मिनट तक मूर्ति स्थापना की शुभ मुहूर्त है |

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गणपति अद्भुत देव है जिन्होंने हर युग में अलग -अलग अवतार लेकर धरती पर जन्म लिए |गणेस जी की शारीरिक रचना भी अद्भुत है |इनके शरीर के ऊपर वाला भाग यानि मस्तक गणेस का है जबकि निचला हिस्सा मानव शरीर का है |

विवाह सम्बंधित कहानी – गणेस जी जब वन में तपश्या कर रहे थे| इसी बीच वहा से तुलसी देवी गुजर रही थी |इन्होने गणेस जी को देख कर उनकी और मोहित हो गयी | यधपि इन्होने गणेस जी के पास अपनी विवाह का प्रस्ताव रख दिया |गणेस जी ने इस प्रस्ताव से साफ़ इंकार कर दिए और बोले में उम्र भर विवाह नहीं करूँगा |इस बात को सुन कर तुलसी क्रोध में आकर गणेस जी को श्राफ दे दि ”तुम्हारी शिघ्र ही दो विवाह होगी ” इस बात को सुन कर गणेस जी भी तुलसी को पौधा बनने का श्राफ दे दिए |

इस तरह दोनों के श्राफ सत्य हुआ | सीघ्र ही भगवान गणेस जी की दो विवाह रिधि और सिद्धि नामक दो कन्याओं से संपन्न हुई ये दोनों जुड़वा बहने थी |और तुलसी भी पौधा बन कर सदा के लिए अमर हो गयी |और आज भी लोग तुलसी के बिना किसी पूजा को शुध नहीं मानते है |

आखिर क्यों गणेश जी की पूजा सबसे पहले कि जाती है ? क्यों गणेश जी की किसी भी कार्य करने से पहले पूजा करना शुभ माना जाता है ?
इसके पीछे एक कहानी जुड़ी है | एक बार देवताओं के मन में एक प्रश्न उठता है पृथ्वी लोक में सबसे पहले किस भगवान की पूजा की जाये, सभी अपने आप को श्रेष्ट बताने लगे | तभी इसका निर्णय ऋषिमुनि नारद जी ने किया और इसके लिऐ भगवान शिव जी को चुने | शिव जी सोच विचार कर बोले ”क्यों ना एक प्रतियोगिता रखी जाये यदपि जो प्रथम पृथ्वि लोक का भ्रमण कर वापस आयेगा उन्ही को पृथ्वी लोक में सबसे पहले पूजा जयेगा |

सभी देवताओं अपनी -अपनी वाहन उठा कर निकले गए |गणेस जी ने अपने माता -पिता के चोरों और सात बार चक्कर लगा कर उनके आगे हाथ जोर कर बेठ गए |गणेस जी ने कहा मेरे ब्रह्मांड मेरे माता -पिता है |

सभी देवताओं को आश्चर्य हुआ यधपि सभी ने गणेश जी को श्रेष्ट बताया |उसी दिन से गणेस जी की पूजा सभी देवताओं से पहले की जाती है |

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