मुहर्रम को मुस्लिमों के गम का पर्व क्यों कहा जाता है ?

मुहर्रम को मुस्लिमों के गम का पर्व क्यों कहा जाता है ?

मुहर्रम मुस्लिमों के पर्वो में से एक प्रमुख और गम का त्यौहार है |जिसे पुरे देश -दुनिया में इश्लाम धर्म के लोग, इमाम हुसैन और उनके अनुयायियों की शहदत को याद कर के मानते है |

इस साल मोहर्रम 10 को यानि आज मनाया जाया रहा है | एक दिन पहले से मुहर्रम के दिन तक रोजा रखा जाता है |इस २ दिन के रोजा का महत्व ,रमजान के 30 रोजा के बराबर होता है |कहा जाता है, इस रोजा को करने से अल्लाह पुरे साल के गुनाहों को माफ़ कर देते है |

.मुहर्रम के आखरी 10 वि दिन को आशुर भी कहा जाता है | यह गम का आखरी दिन होता है |मुहर्रम की रोजा बहुत महत्वपूर्ण होती है |और इस दिन मस्जिदों और घरो में इबादत दि जाती है |

मोहर्रम इस्लामी नई वर्ष की पहली पर्व होती है |रमजान के बाद नया साल का सबसे पहला और पवित्र माह माना जाता है |इस दिन तलवार बाजी किया जाता है और शौक मनाने की कोशिस की जाती है |

ताजिया लकड़ी और कापड़ो से बनाया जाता है | इसके अंदर हुसैन का कब्र का नकल बनाया जाता है | इस दिन ताजिया को लेकर सड़क पर झाँकी निकाली जाता है और इनको शहीदों की अर्थी की तरह सम्मान दिया जाता है |

Ganita Yadav

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